बिहार चुनाव 2025: अब जात नहीं, रोजगार तय करेगा जनता का फैसला

बिहार चुनाव 2025

बिहार की राजनीति एक नए मोड़ पर पहुंच चुकी है। 2025 का विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि सोच और प्राथमिकताओं में बदलाव का संकेत देता है। जहां कभी चुनावी समीकरण जात और पहचान के आधार पर तय होते थे, अब फोकस रोजगार, विकास, महिला सशक्तिकरण और आर्थिक प्रगति जैसे ठोस मुद्दों पर है।

एनडीए और महागठबंधन दोनों ने अपने घोषणा पत्रों में यह दिखाया है कि जनता, खासतौर पर युवा मतदाता, अब केवल जातीय अपील नहीं बल्कि वास्तविक काम और अवसरों की तलाश में हैं।

बिहार की बदलती राजनीतिक भाषा

बिहार की राजनीति लंबे समय तक जातीय समीकरणों पर आधारित रही। लालू प्रसाद यादव ने पिछड़ी जातियों को राजनीति में सशक्त बनाया और सामाजिक न्याय को केंद्र में रखा। बाद में नीतीश कुमार ने सुशासन और विकास को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया।

हालांकि, दोनों नेताओं के दौर के बाद भी जाति का प्रभाव बना रहा। यादवों का वर्चस्व, अतिपिछड़ों की लामबंदी और सवर्ण-दलित संतुलन ने दशकों तक चुनावी समीकरण तय किए।

लेकिन अब स्थिति बदल रही है। 2025 के विधानसभा चुनाव में जातीय अपील के बजाय रोजगार, उद्योग, शिक्षा और महिला भागीदारी जैसे ठोस मुद्दे चर्चा में हैं। दोनों प्रमुख गठबंधनों के घोषणा पत्रों से यह साफ झलकता है कि बिहार का मतदाता अब प्रतीकात्मक राजनीति नहीं बल्कि वास्तविक सुधार चाहता है।

एनडीए और महागठबंधन के घोषणा पत्र

31 अक्टूबर 2025 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की मौजूदगी में एनडीए ने अपना संकल्प पत्र जारी किया। इसमें रोजगार सृजन, औद्योगिक विस्तार, कौशल विकास और निजी निवेश पर जोर दिया गया।

दूसरी ओर, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने पटना में महागठबंधन का घोषणा पत्र ‘बिहार का तेजस्वी प्रण’ जारी किया। इसमें हर परिवार के एक सदस्य को रोजगार देने, संविदा कर्मचारियों को नियमित करने, पेंशन बहाली और महिलाओं को वित्तीय सहायता जैसी योजनाओं का वादा किया गया।

दोनों घोषणापत्र विचारधारा में भले अलग हैं, लेकिन दोनों इस बात पर सहमत हैं कि बिहार का मतदाता, खासकर 35 वर्ष से कम उम्र का युवा, अब जातीय राजनीति से हटकर अवसर और विकास चाहता है।

बिहार में रोजगार सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा

बिहार में बेरोजगारी दर अप्रैल से जून 2025 के बीच 10.4 प्रतिशत रही। कार्यशील आबादी का केवल 46.2 प्रतिशत ही आर्थिक रूप से सक्रिय है, जिसका मतलब है कि आधे से ज्यादा लोग कामकाज से बाहर हैं।

महागठबंधन ने वादा किया है कि सरकार बनने के 20 दिनों के भीतर हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाएगी और रोजगार गारंटी कानून लागू किया जाएगा। यह योजना राज्य की 3.5 करोड़ कामकाजी आबादी को लक्ष्य करती है। साथ ही सभी संविदा कर्मियों को स्थायी करने और जीविका समूह की महिलाओं को सरकारी कर्मचारी बनाकर 30,000 रुपये मासिक वेतन देने की घोषणा की गई है।

एनडीए ने एक करोड़ सरकारी नौकरियों और रोजगार अवसरों का लक्ष्य रखा है। इसके लिए हर जिले में मेगा स्किल सेंटर खोलने, एक विस्तृत कौशल सर्वे कराने और बिहार को ‘ग्लोबल स्किलिंग हब’ बनाने की योजना पेश की गई है। साथ ही 50 लाख करोड़ रुपये के निजी निवेश को आकर्षित करने का लक्ष्य भी रखा गया है ताकि उद्योग और सेवा क्षेत्र में नए अवसर पैदा हों।

एनडीए का मॉडल बाजार-आधारित है, जबकि महागठबंधन का दृष्टिकोण सरकारी हस्तक्षेप पर केंद्रित है। फिर भी दोनों इस बात को मानते हैं कि रोजगार अब किसी एक वर्ग या जाति का नहीं, बल्कि हर नागरिक की प्राथमिक जरूरत बन चुका है।

बिहार चुनाव 2025
Image Credit – Newsonair

महिलाओं की भूमिका और आर्थिक सशक्तिकरण

बिहार में लगभग 3.5 करोड़ महिला मतदाता हैं। यही कारण है कि दोनों गठबंधनों ने महिलाओं के लिए विशेष योजनाएँ पेश की हैं।

महागठबंधन ने ‘माई-बहिन मान योजना’ के तहत हर महिला को पाँच साल तक 2,500 रुपये मासिक और 30,000 रुपये वार्षिक सहायता देने का वादा किया है। इसके साथ ही जीविका कार्यकर्ताओं को स्थायी सरकारी नौकरी देने की घोषणा की गई है।

एनडीए ने ‘लखपति दीदी योजना’ पर ध्यान केंद्रित किया है, जिसका लक्ष्य एक करोड़ महिलाओं को सालाना एक लाख रुपये की आय वाला उद्यमी बनाना है। ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ के तहत महिलाओं को दो लाख रुपये तक की सहायता दी जाएगी ताकि वे अपना व्यवसाय शुरू कर सकें। ‘मिशन करोड़पति’ योजना में सफल महिला उद्यमियों को व्यापार विस्तार का मौका देने की बात कही गई है।

महागठबंधन महिलाओं को सरकारी सहायता के जरिए सशक्त बनाना चाहता है, जबकि एनडीए उन्हें उद्यमिता के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाना चाहता है। दोनों का उद्देश्य समान है। महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना।

जाति से आगे बढ़ता मतदाता

बिहार का मतदाता अब जातीय समीकरणों से आगे बढ़ चुका है। मंडल राजनीति के बाद यादव, कुर्मी और अन्य पिछड़े वर्ग राजनीति के केंद्र में रहे, लेकिन अब नई पीढ़ी विकास और प्रशासनिक क्षमता को प्राथमिकता देती है।

2024 तक के अध्ययनों में पाया गया कि शिक्षित और शहरी मतदाता जाति से ऊपर उठकर प्रदर्शन और अवसर को आधार बना रहे हैं। एनडीए ने अपने घोषणा पत्र में 10 औद्योगिक पार्क, सात नए एक्सप्रेसवे, चार शहरों में मेट्रो सेवा और सेमीकंडक्टर निर्माण हब जैसी योजनाएँ पेश की हैं। वहीं महागठबंधन ने रोजगार गारंटी, पेंशन बहाली और शिक्षा सुधार पर जोर दिया है।

दोनों गठबंधन अब सर्वांगीण विकास की बात कर रहे हैं, न कि किसी खास जाति की।

आर्थिक वास्तविकता और चुनौतियाँ

बिहार अब भी भारत का सबसे गरीब राज्य है। प्रति व्यक्ति आय सबसे कम है और शहरीकरण दर केवल 12.4 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 35.7 प्रतिशत है। ऐसे में दोनों गठबंधनों के वादों पर अमल कर पाना आसान नहीं होगा।

महागठबंधन का “हर परिवार को एक सरकारी नौकरी” का वादा बजट पर भारी पड़ेगा। राज्य के दो करोड़ से अधिक परिवारों के लिए यह योजना लागू करना मौजूदा वित्तीय संसाधनों से संभव नहीं है।

एनडीए का 50 लाख करोड़ रुपये का निवेश लक्ष्य भी चुनौतीपूर्ण है। फिलहाल बिहार का औद्योगिक क्षेत्र राज्य की कुल जीएसडीपी में सिर्फ 5 से 6 प्रतिशत का योगदान देता है।

फिर भी कुछ सकारात्मक संकेत हैं। 2024-25 में बिहार की अर्थव्यवस्था ने 13.9 प्रतिशत की विकास दर दर्ज की, जो राष्ट्रीय औसत 9.8 प्रतिशत से अधिक है। उद्योग क्षेत्र में 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई और निवेश में सुधार दिखा। 2024 के बिहार बिजनेस कनेक्ट में 1.8 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव मिले। अडानी पावर का 2,400 मेगावाट बिजली संयंत्र और परमाणु ऊर्जा परियोजना की स्वीकृति निवेशकों का भरोसा बढ़ाने में मदद कर रही है।

लेकिन चुनौतियाँ अब भी हैं। बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है और शिक्षा की गुणवत्ता चिंताजनक है। राज्य में लगभग 87 प्रतिशत कक्षा 3 के छात्र कक्षा 2 के स्तर का पाठ नहीं पढ़ पाते, जिससे कौशल विकास की राह कठिन हो जाती है।

मतदाताओं की नई सोच और बदलती राजनीतिक संस्कृति

बिहार का मतदाता अब पहचान और प्रतीकवाद से आगे बढ़ चुका है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसे मुद्दे अब चुनावी बहस के केंद्र में हैं।

रोजगार अब केवल आय का साधन नहीं बल्कि सामाजिक सम्मान और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया है। महिलाएँ अब केवल कल्याण योजनाओं की लाभार्थी नहीं रहीं, बल्कि आर्थिक बदलाव की सक्रिय भागीदार बन गई हैं।

इसे भी पढ़ें – बिहार चुनाव 2025 में जातिगत राजनीति का प्रभाव

निष्कर्ष: बिहार की राजनीति के नए युग की शुरुआत

2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए का संकल्प पत्र और महागठबंधन का बिहार का तेजस्वी प्रण दोनों यह दिखाते हैं कि राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव आ चुका है। जात, धर्म और पहचान अब भी मौजूद हैं, लेकिन वे अब निर्णायक कारक नहीं हैं।

बिहार का मतदाता अब ठोस काम चाहता है रोजगार, सड़क, अस्पताल, स्कूल और विकास की गारंटी। दोनों गठबंधनों के वादे वित्तीय और प्रशासनिक चुनौतियों से घिरे हैं, लेकिन यह बदलाव आशाजनक है कि बिहार अब वास्तविक मुद्दों पर राजनीति कर रहा है।

अगर आने वाले वर्षों में ये वादे जमीन पर उतरते हैं, तो बिहार उस दिशा में आगे बढ़ेगा जहाँ राजनीति का आधार जात नहीं बल्कि प्रगति और रोजगार होगा। यही वह परिवर्तन है जिसकी बिहार को लंबे समय से जरूरत थी। एक ऐसी राजनीति जो पहचान से आगे बढ़कर अवसर और विकास की बात करे।

Source: In Bihar manifesto, how NDA blends outreach to poor with aspirational pitch, addresses jobs issue & Bihar Ka Tejashwi Pran’: INDIA bloc releases poll manifesto, promises to ‘get state back on track

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