वह रेखा जिसने इतिहास बदल दिया: 1947 के भारत विभाजन की असली कहानी

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1947 में भारत के बंटवारे की असली कहानी और उस रेखा के बारे में जानिए जिसने हमेशा के लिए इतिहास की दिशा बदल दी। यह समझिए कि सीमा इतनी जल्दबाज़ी में कैसे खींची गई, क्यों लाखों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा, और कैसे हिंसा, नुकसान और कश्मीर का मुद्दा भारत और पाकिस्तान की तक़दीर से जुड़ गया। यह इतिहास के एक दर्दनाक पल की सरल और प्रभावशाली कहानी है।

परिचय

अगस्त 1947 में दिल्ली के एक बंद कमरे में एक आदमी अकेला बैठा था। सामने नक्शे, आंकड़े और काग़ज़ फैले थे। उसके हाथ में सिर्फ़ एक पेंसिल थी। उससे कहा गया था कि वह ऐसा काम करे जो इतिहास को हमेशा के लिए बदल देगा। उसकी खींची हुई रेखाएं एक देश को दो हिस्सों में बांटने वाली थीं। उन्हीं रेखाओं की वजह से क़रीब दो करोड़ लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा और लाखों लोगों की जान चली गई। उस आदमी का नाम था सर सिरिल रेडक्लिफ। हैरानी की बात यह थी कि कुछ हफ्ते पहले तक उन्होंने भारत को देखा भी नहीं था।

यह कहानी है कि भारत और पाकिस्तान की सीमा कैसे तय हुई, बंटवारा इतनी जल्दी क्यों हुआ, और कैसे एक मुल्क ने इंसानी इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक को झेला।

अंग्रेज़ों का भारत छोड़ने का फ़ैसला

1947 तक भारत में अंग्रेज़ी हुकूमत कमजोर पड़ चुकी थी। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा तेज़ी से फैल रही थी। अंग्रेज़ प्रशासन समझ चुका था कि हालात अब उसके काबू में नहीं हैं। भारत के आख़िरी वायसराय लॉर्ड लुई माउंटबेटन ने 3 जून 1947 को एलान किया कि 15 अगस्त तक ब्रिटेन भारत छोड़ देगा।

लेकिन इसके साथ एक बड़ी शर्त थी। भारत को दो अलग-अलग देशों में बांटा जाएगा। एक भारत होगा और दूसरा पाकिस्तान। अंग्रेज़ों को लगा कि बढ़ते संकट से निकलने का यह सबसे तेज़ रास्ता है। उन्हें जल्दी निकलना था, भले ही पीछे अव्यवस्था रह जाए।

सर सिरिल रेडक्लिफ को क्यों चुना गया

नेहरू और जिन्ना एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते थे और इस बात पर सहमत नहीं हो पा रहे थे कि सीमा कहां होनी चाहिए। पक्षपात के आरोपों से बचने के लिए अंग्रेज़ों ने ऐसे व्यक्ति को चुना जो भारत से पूरी तरह अनजान हो।

सर सिरिल रेडक्लिफ एक जाने-माने ब्रिटिश वकील थे, लेकिन उन्हें भारत के भूगोल, संस्कृति या राजनीति का कोई अनुभव नहीं था। यही वजह थी कि उन्हें चुना गया। अंग्रेज़ों को एक ऐसा “तटस्थ” आदमी चाहिए था जिसका इस ज़मीन या इसके लोगों से कोई भावनात्मक रिश्ता न हो। रेडक्लिफ 8 जुलाई 1947 को भारत पहुंचे और उन्हें बताया गया कि दो नए देशों की सीमा तय करने के लिए उनके पास सिर्फ़ कुछ ही हफ्ते हैं।

ज़मीन देखे बिना सीमा खींचना

रेडक्लिफ को पुराने नक्शे, अधूरे जनसंख्या आंकड़े और बहुत कम दिशा-निर्देश दिए गए। उन्हें इलाक़ों का दौरा करने या हालात समझने का समय नहीं मिला। उनके पास चार सलाहकार थे, दो कांग्रेस से और दो मुस्लिम लीग से, लेकिन मदद करने के बजाय वे अक्सर आपस में बहस करते रहते थे।

काग़ज़ पर नियम आसान था। जहां मुसलमानों की बहुमत आबादी हो, वह पाकिस्तान को मिले। जहां हिंदू और सिख ज़्यादा हों, वह भारत में रहे। लेकिन हक़ीक़त बहुत जटिल थी। मिली-जुली आबादी, साझा नदियां, रेलवे लाइनें और शहर साफ़ बंटवारे को लगभग नामुमकिन बना रहे थे।

लाहौर और गुरदासपुर की समस्या

दो इलाक़ों ने सबसे ज़्यादा परेशानी पैदा की। लाहौर एक बड़ा सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र था, लेकिन यहां साफ़ बहुमत नहीं था। मुसलमान सबसे बड़ा समुदाय थे, लेकिन ज़्यादातर उद्योग हिंदुओं और सिखों के हाथ में थे। शुरुआत में रेडक्लिफ ने लाहौर को भारत में देने पर विचार किया, लेकिन बाद में उन्होंने सोचा कि पाकिस्तान को भी कम से कम एक बड़ा शहर मिलना चाहिए। आख़िरकार लाहौर पाकिस्तान को दे दिया गया।

गुरदासपुर का मामला और भी विवादित था। वहां मुसलमान बहुमत में थे, फिर भी रेडक्लिफ ने उसे भारत में शामिल कर दिया। इससे भारत को कश्मीर तक ज़मीनी रास्ता मिल गया। पाकिस्तान ने इसका कड़ा विरोध किया और इसे नाइंसाफ़ी माना। यही फ़ैसला आगे चलकर कश्मीर विवाद की एक बड़ी वजह बना।

सीमा से पहले आज़ादी

माउंटबेटन को रेडक्लिफ की रिपोर्ट 13 अगस्त 1947 को मिल गई थी, लेकिन उन्होंने इसे सार्वजनिक नहीं किया। उन्हें डर था कि अगर आज़ादी से पहले सीमा घोषित हुई तो तुरंत हिंसा भड़क उठेगी।

15 अगस्त को भारत और पाकिस्तान आज़ाद हो गए, लेकिन लाखों लोग यह नहीं जानते थे कि वे किस देश के नागरिक हैं। ज़िला अधिकारी, पुलिस और आम लोग सब उलझन में थे। दो दिन बाद, 17 अगस्त को सीमा का एलान हुआ। तब तक हालात काबू से बाहर जा चुके थे।

इतिहास का सबसे बड़ा पलायन

सीमा सामने आते ही पंजाब और बंगाल में अफ़रातफ़री मच गई। लगभग दो करोड़ लोगों को मजबूरी में पलायन करना पड़ा। हिंदू और सिख भारत की ओर जाने लगे, मुसलमान पाकिस्तान की ओर। जो लोग पीढ़ियों से एक ही जगह रह रहे थे, वे रातों-रात शरणार्थी बन गए।

लोगों के लंबे काफ़िले धूप में कई-कई दिनों तक पैदल चलते रहे। बूढ़े, औरतें और बच्चे जो उठा सकते थे, वही लेकर निकले। पूरे परिवार उजड़ गए। उनके साथ हर जगह हिंसा भी चलती रही।

हिंसा और भूतिया ट्रेनें

सरकार ने 55,000 सैनिकों की सीमा सुरक्षा फ़ोर्स बनाई, लेकिन खूनखराबा नहीं रुक सका। ट्रेनें डर की निशानी बन गईं। कई ट्रेनें सिर्फ़ लाशों से भरी हुई पहुंचीं। इन्हें बाद में “भूतिया ट्रेनें” कहा गया।

गांव जला दिए गए। औरतों का अपहरण हुआ। पड़ोसी एक-दूसरे के दुश्मन बन गए। हर तरफ़ डर का माहौल था। पंजाब में सबसे ज़्यादा हिंसा हुई, लेकिन बंगाल भी बहुत नाज़ुक हालात में था।

गांधी और कोलकाता का चमत्कार

जब बंगाल में हालात विस्फोटक हो गए, तो माउंटबेटन ने महात्मा गांधी से मदद मांगी। गांधी कोलकाता पहुंचे और एक साधारण घर में रहने लगे, जहां हुसैन शहीद सुहरावर्दी भी थे, जिन्हें पहले हुए दंगों के लिए दोषी माना जाता था।

गांधी ने एलान किया कि अगर हिंसा नहीं रुकी तो वे अनशन करके जान दे देंगे। उनकी मौजूदगी से हालात बदल गए। कई हफ्तों तक दंगे रुक गए। जब हिंसा फिर लौटी तो गांधी ने अनशन शुरू कर दिया। हिंदू, मुसलमान और सिख सबने हथियार डाल दिए। इस घटना को “कोलकाता का चमत्कार” कहा गया।

रियासतों की समस्या

बंटवारा ही एकमात्र चुनौती नहीं थी। भारत में 565 देसी रियासतें थीं। उनके शासकों को यह चुनने की आज़ादी थी कि वे भारत में मिलें, पाकिस्तान में जाएं या आज़ाद रहें। अगर ज़्यादातर रियासतें आज़ाद हो जातीं तो भारत टूट जाता।

सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन ने यह ज़िम्मेदारी संभाली। माउंटबेटन की मदद से उन्होंने ज़्यादातर राजाओं को भारत में शामिल होने के लिए मना लिया। एकता बनाए रखने के लिए कुछ समय तक उनके ख़िताब और सुविधाएं बरक़रार रखी गईं।

कश्मीर और पहली जंग

कश्मीर सबसे ख़तरनाक मुद्दा बन गया। वहां मुसलमान बहुमत में थे, लेकिन शासक महाराजा हरि सिंह हिंदू थे। वे आज़ाद रहना चाहते थे। पाकिस्तान ने कबायली हमलों का समर्थन किया ताकि कश्मीर को अपने साथ मिलाया जा सके।

जब हालात बिगड़े तो हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और विलय पत्र पर दस्तख़त किए। भारतीय फ़ौज श्रीनगर पहुंची और जंग शुरू हो गई। 1949 में संघर्षविराम हुआ और कश्मीर दो हिस्सों में बंट गया। यही आज की नियंत्रण रेखा है।

निष्कर्ष

1947 का विभाजन सिर्फ़ दो देशों का जन्म नहीं था। यह जल्दबाज़ी में लिए गए फ़ैसले की क़ीमत थी, जिसे पेंसिल से खींचा गया लेकिन खून, आंसुओं और उम्र भर के ज़ख़्मों से चुकाया गया। कुछ हफ्तों में खींची गई एक रेखा ने सदियों का साझा इतिहास तोड़ दिया। लोगों ने अपने घर, पहचान और अपने प्रिय खो दिए, अक्सर बिना यह समझे कि क्यों।

भारत बच गया, लेकिन गहरे ज़ख़्मों के साथ। पाकिस्तान दर्द और अनिश्चितता के बीच पैदा हुआ। कश्मीर एक खुला घाव बन गया, जो आज भी रिश्तों को प्रभावित करता है।

फिर भी इस त्रासदी के बीच इंसानियत की मिसालें भी थीं। आम लोगों ने अपने पड़ोसियों की जान बचाई। गांधी जैसे नेताओं ने याद दिलाया कि अंधेरे में भी अमन मुमकिन है। विभाजन हमें यह सख़्त सबक देता है कि जल्दबाज़ी में लिए गए राजनीतिक फ़ैसले पीढ़ियों तक दर्द दे सकते हैं। इस इतिहास को याद रखना किसी को दोष देने के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए है कि बंटवारे की असली क़ीमत क्या होती है, ताकि ऐसी त्रासदी फिर कभी न दोहराई जाए।

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Source: partition of India & 79 Years Of Radcliff Line: Story Of How India And Pakistan Were Divided

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