मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि साल 2024 में देश का औसत तापमान 1991 से 2020 की तुलना में करीब 0.65 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा। यह अंतर भले सुनने में छोटा लगे, लेकिन भारतीय कृषि पर इसका गहरा असर हो रहा है। खासतौर पर रातों का गर्म रहना गेहूं, चना और सरसों जैसी प्रमुख फसलों के लिए खतरे की घंटी है। इन फसलों को फूल आने और पकने के समय ठंडी रातों की जरूरत होती है, ताकि दाने अच्छे से भर सकें। जब तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है, तो दाने अधूरे रह जाते हैं और पैदावार घट जाती है। किसानों का कहना है कि वे खेत में उतनी मेहनत तो कर रहे हैं, लेकिन बदलते मौसम की मार से उनकी फसलें पहले जैसी मजबूती नहीं दे पा रही हैं।
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उत्तरी भारत में लू का प्रकोप
2025 की गर्मियों में भारत और पाकिस्तान में हीटवेव चार महीने तक चली। राजस्थान में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। इतनी ज्यादा गर्मी में खेतों में काम करना लगभग नामुमकिन हो जाता है। कई जगह मजदूर खेत छोड़कर चले जाते हैं, जिससे फसल की बुवाई और कटाई में देरी होती है। गर्म हवाओं से कई फसलें झुलस जाती हैं और किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ता है।
कहीं बारिश ज्यादा तो कहीं बिल्कुल कम
हरियाणा के कई जिलों में 2023 से 2025 के बीच बारिश सामान्य से 37% ज्यादा हुई। इससे खेतों में पानी भर गया और धान, कपास और अन्य फसलें खराब हो गईं। दूसरी ओर पंजाब में अगस्त 2025 में भयंकर बाढ़ आई। एक हजार से ज्यादा गांवों की 61,000 हेक्टेयर जमीन डूब गई। करीब 15 लाख लोग विस्थापित हुए। यह बाढ़ 1988 के बाद सबसे बड़ी मानी जा रही है।
पूर्वोत्तर भारत में सूखा
जहां एक तरफ पंजाब जैसे राज्य बाढ़ से जूझ रहे थे, वहीं असम के पांच जिलों में बारिश 40% कम हुई। वहां सूखे का ऐलान करना पड़ा। यानी एक ही समय में देश के एक हिस्से में किसान फसलें डुबोने से परेशान थे और दूसरे हिस्से में फसलें पानी की कमी से सूख रही थीं। यही ग्लोबल वार्मिंग का सबसे बड़ा खतरा है कि मौसम का कोई भरोसा नहीं रहा।
बढ़ती महंगाई और किसानों की आमदनी पर असर
जब फसलें खराब होती हैं तो बाजार में सब्जियों और अनाज की कमी हो जाती है। 2023 और 2024 में यही हुआ। जुलाई 2023 में सब्जियों की महंगाई 37% तक पहुंच गई, और अक्टूबर 2024 में यह 42% हो गई। रिजर्व बैंक का अनुमान है कि तापमान और बारिश में बदलाव से ही महंगाई में लगभग 1 से 1.5 प्रतिशत तक इजाफा हो जाता है। इससे आम आदमी को महंगा खाना पड़ता है और किसानों की कमाई भी स्थिर नहीं रह पाती।
किसानों का अनुभव: बदलाव का असर
2024–2025 के एक सर्वे में सामने आया कि 71% भारतीयों ने खुद हीटवेव का असर महसूस किया। 60% लोगों ने कीट और बीमारियों की समस्या बढ़ते हुए देखी। आधे से ज्यादा लोग पानी की कमी और गंदे पानी से परेशान हुए। यानी अब यह सिर्फ वैज्ञानिकों की रिपोर्ट नहीं रही, बल्कि आम लोग और किसान खुद इन बदलावों को जी रहे हैं।
सामान्य मानसून के बावजूद सूखे का खतरा
भारत मौसम विभाग ने 2025 के लिए औसत से 105% ज्यादा बारिश का अनुमान जताया था। लेकिन चेतावनी यह भी थी कि भले ही कुल मिलाकर बारिश ठीक हो, कुछ इलाकों में सूखा जैसी स्थिति बनी रह सकती है। उदाहरण के लिए, केरल में बारिश का पैटर्न बदल गया, जिससे फसलें प्रभावित हुईं। इसलिए अब किसानों को मौसम के ऐप्स और नई तकनीक से जुड़े रहना जरूरी है ताकि समय रहते वे अपने खेतों की सुरक्षा कर सकें।
नई तकनीक और मौसम की सटीक जानकारी
मई 2025 में भारत ने भारत फोरकास्टिंग सिस्टम लॉन्च किया। यह 6 किलोमीटर के दायरे तक का सटीक मौसम पूर्वानुमान देने वाला मॉडल है। अब किसानों को छोटे स्तर पर भी मौसम की जानकारी मिल सकेगी। इससे वे यह तय कर पाएंगे कि कब बीज बोना है, कब खाद डालना है और कब सिंचाई करनी है। यह तकनीक उन्हें नुकसान कम करने में मदद करेगी।
बढ़ते तापमान से लंबे समय का नुकसान
नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (NABARD) की हाल की स्टडी बताती है कि अगर तापमान सिर्फ 1% (लगभग 0.26 डिग्री) बढ़ता है तो लंबे समय में खाद्यान्न उत्पादन 6.5% तक घट सकता है। यह आंकड़ा साफ दिखाता है कि अगर हम अभी कदम नहीं उठाते तो आने वाले सालों में देश की खाद्य सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडरा सकता है।
चुनौतियों के बीच खेती की मजबूती
बार-बार आपदाओं के बावजूद भारत का कुल अनाज उत्पादन अभी भी ठीक रहा है। लेकिन कृषि क्षेत्र की ग्रोथ धीमी हो गई है। इसका मतलब है कि किसान लगातार मेहनत कर रहे हैं, लेकिन उन्हें पहले जितना फायदा नहीं मिल रहा।
2025 की सरकारी पहल
सरकार ने जुलाई 2025 में प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना शुरू की। इसका मकसद 100 पिछड़े जिलों के 1.7 करोड़ किसानों को मदद देना है। इसमें 24,000 करोड़ रुपये का सालाना बजट रखा गया है ताकि किसानों को सिंचाई, भंडारण और कर्ज में आसानी मिल सके। यह योजना दिखाती है कि सरकार भी अब इस चुनौती को गंभीरता से ले रही है।
2025 की प्रमुख जानकारियों का सारांश
| जलवायु कारक | कृषि पर असर |
|---|---|
| +0.65 °C तापमान बढ़ोतरी | गेहूं, धान और बागवानी फसलों पर पैदावार का दबाव |
| 48 °C तक हीटवेव | फसलों और मजदूरों पर असर, कामकाज में बाधा |
| हरियाणा में 37% अधिक बारिश | बाढ़ से फसल का नुकसान |
| पंजाब में बाढ़ | 61,000 हेक्टेयर डूबे, 15 लाख लोग विस्थापित |
| असम में सूखा | लगभग 40% कम बारिश, फसलों पर दबाव |
| सब्जियों की महंगाई बढ़ी | 2023–24 में 37% से 42% तक वृद्धि |
| पूर्वानुमान तकनीक में सुधार | गेहूं, धान और बागवानी फसलों की पैदावार में मदद |
निष्कर्ष
ग्लोबल वार्मिंग अब कोई दूर की समस्या नहीं रही। यह हर किसान की हकीकत बन चुकी है। कहीं गर्मी से फसलें झुलस रही हैं, कहीं बाढ़ से डूब रही हैं, तो कहीं पानी की कमी से सूख रही हैं। इसके असर महंगाई से लेकर लोगों की जिंदगी तक सब पर दिख रहे हैं। अच्छी बात यह है कि किसान नई तकनीकों और सरकारी योजनाओं के सहारे धीरे-धीरे बदलते हालात से लड़ना सीख रहे हैं। लेकिन भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम कितनी जल्दी इन समाधानों को बड़े स्तर पर लागू कर पाते हैं और ग्रामीण भारत तक पहुंचा पाते हैं।
References: Farmonaut, Nabard.org, Agriwelfare.gov.in
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