पिछले कुछ सालों में दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है, इसी बदलाव के बीच BRICS (ब्रिक्स) नाम का संगठन लगातार मजबूत होता जा रहा है, ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका से शुरू हुआ यह समूह अब और भी बड़ा हो गया है. 2023 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी इसमें शामिल हो गए हैं।
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2024 के कज़ान शिखर सम्मेलन में 36 देशों के नेताओं की मौजूदगी ने ये साबित कर दिया है कि दुनिया अब BRICS को हल्के में नहीं ले रही है ऐसे में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वह इस मंच का संस्थापक सदस्य है, अब भारत इस प्लेटफॉर्म को अपने फायदे के लिए और भी बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर रहा है।
संतुलन की रणनीति:
भारत BRICS को हमेशा से अपनी विदेश नीति का एक अहम हिस्सा मानता आया है। यहाँ भारत न तो पूरी तरह पश्चिम (अमेरिका और यूरोप) के साथ है और न ही रूस-चीन के साथ। भारत की यह संतुलन बनाए रखने की नीति ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनाती है।
इस मंच के ज़रिए भारत दुनिया को यह दिखा रहा है कि वह एक स्वतंत्र खिलाड़ी है। IMF और वर्ल्ड बैंक जैसे वैश्विक संस्थानों में सुधार की मांग हो या फिर ऊर्जा सुरक्षा और क्लाइमेट फाइनेंसिंग का मुद्दा, भारत BRICS के जरिए इन सभी मामलों में अपनी बात मजबूती से रखते आ रहा है।
नए पार्टनर से भारत को मिली बढ़त
BRICS के विस्तार से भारत को कई नए साझेदार मिले हैं। जिसमें सबसे अहम ईरान, सऊदी अरब और UAE जैसे देश शामिल हैं। ईरान के साथ भारत का चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट पहले से ही सुर्खियों में है। यह प्रोजेक्ट भारत, ईरान और अफ़गानिस्तान के बीच संबंध को मजबूत कर सकता है और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का एक बेहतर विकल्प बन सकता है।
दूसरी ओर, सऊदी अरब और UAE जैसे बड़े तेल उत्पादक देशों के आने से भारत को अपनी ऊर्जा की जरूरतें पूरी करने का और भी बेहतर मौका मिलेगा। इससे भारत को तेल सस्ता मिल सकता है और इसके रिश्ते इन देशों के साथ और भी मजबूत होंगे।
अर्थव्यवस्था के लिए BRICS कैसे फायदेमंद है?
BRICS भारत को एक ऐसा आर्थिक आकार देता है जो पूरी तरह से पश्चिमी देशों पर निर्भर नहीं है। 2017 से 2022 के बीच BRICS देशों के बीच आपसी व्यापार में 56 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह अब 615 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। जब रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने इस मौके का फायदा उठाते हुए रूस से सस्ते तेल की खरीद बढ़ा दी। इससे भारत की अर्थव्यवस्था को सीधा फायदा हुआ था।
इसके अलावा, BRICS का न्यू डेवलपमेंट बैंक भारत की घरेलू परियोजनाओं को फंड देता है। यानी सड़कें, ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे प्रोजेक्ट्स के लिए भारत को यहीं से मदद मिल सकती है।
पश्चिम और BRICS दोनों से रिश्ते बनाए रखने की कला
भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह दोनों तरफ से रिश्ते निभा रहा है। एक तरफ अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड(QUAD) में है, तो दूसरी तरफ रूस और चीन के साथ BRICS में भी मौजूद है।
जहां रूस से भारत को तेल और हथियार मिलते हैं, वहीं अमेरिका और यूरोप से टेक्नोलॉजी और निवेश आता है। इस तरह भारत ने एक तरह से दो नावों पर सवारी कर ली है और अभी तक यह संतुलन बखूबी बना कर रखी है।
ब्रिक्स के भीतर भारत के लिए चुनौतियाँ
BRICS में भारत के रास्ते आसान नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कहीं यह मंच पूरी तरह चीन-केंद्रित न हो जाए। भारत नहीं चाहता कि BRICS को पश्चिम-विरोधी मंच के रूप में देखा जाए। उसकी कोशिश यही रहती है कि इसे एक संतुलित और गैर-पश्चिमी समूह माना जाए।
भारत पाकिस्तान की संभावित सदस्यता को भी रोकने की कोशिश करता रहा है, क्योंकि उसे डर है कि ऐसा होने पर चीन का प्रभाव और बढ़ जाएगा। इसके अलावा, रूस और चीन BRICS को पश्चिम के सीधे विकल्प के रूप में पेश करना चाहते हैं, जबकि भारत का मानना है कि इस संगठन को संतुलित रहना चाहिए।
ब्रिक्स के भीतर भारत-चीन की गतिशीलता
भारत और चीन के रिश्ते BRICS में सबसे मुश्किल हैं। सीमा विवाद और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा ने इन रिश्तों को हमेशा मुश्किल बनाए रखा है। फिर भी BRICS एक ऐसा मंच है जहाँ दोनों देश बातचीत करते हैं।
2024 के कज़ान शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात हुई। यह पाँच साल बाद पहली बड़ी बैठक थी. दोनों नेताओं ने सीमा पर स्थिरता और आपसी भरोसे पर जोर दिया। यह बैठक दिखाता है कि दोनों देश BRICS को और मजबूत बनाने के लिए तनाव कम करने की कोशिश कर रहे हैं।
निष्कर्ष
भारत ने BRICS को अपनी विदेश नीति का एक अहम हथियार बना लिया है। जिसके फलस्वरूप इसे ऊर्जा, वित्तीय सहयोग और नए बाजार मिल रहे हैं। साथ ही यह चीन और रूस के प्रभाव को संतुलित भी कर रहा है।
हालांकि चुनौतियां हैं, लेकिन अगर भारत BRICS के भीतर सहमति और सहयोग बढ़ाने में सफल रहता है, तो वह ग्लोबल साउथ की सबसे मजबूत आवाज़ बन सकता है। इससे न सिर्फ भारत की वैश्विक शाख बढ़ेगी, बल्कि वह दुनिया की राजनीति में एक असली संतुलन बनाने वाला देश भी बन जाएगा।
Sources:
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