इस्लामी तक़रीबी साल का तीसरा महीना रबीउल अव्वल कहलाता है। यह महीना मुसलमानों के लिए बहुत बड़ी नेमत है क्योंकि इसी महीने में सरवर-ए-कायनात, रहमतुल-लिल-आलमीन हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की विलादत हुई। यह महीना हमें मोहब्बत, रहमत, इंसाफ़ और इंसानियत के असूलों की याद दिलाता है।
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पैग़म्बर ﷺ की विलादत और तारीख़ी अहमियत
रबीउल अव्वल की 12 तारीख़ को नबी-ए-करीम ﷺ की विलादत हुई। यह दिन ईमानवालों के लिए सबसे बड़ी ख़ुशी और रहमत का दिन है। इसे ईद मिलादुन्नबी कहा जाता है। दुनिया भर के मुसलमान इस दिन इज़हार-ए-मोहब्बत और शुक्र गुज़ारी करते हैं।
इस महीने की एक और तारीख़ी अहमियत यह भी है कि हिजरत-ए-मदीना भी रबीउल अव्वल में हुई। जब नबी ﷺ ने मक्का से मदीना का सफ़र किया तो इस्लामी तहज़ीब की बुनियाद पुख़्ता हुई। यही सफ़र बाद में इस्लामी तारीख़ का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।
ईद मिलादुन्नबी की रूहानी कैफ़ियत
ईद मिलादुन्नबी का दिन मुसलमानों के लिए सिर्फ जश्न का मौक़ा नहीं बल्कि रूहानी कैफ़ियत का दिन है। इस दिन लोग मसाजिद सजाते हैं, दरूद-ओ-सलाम पेश करते हैं, नात-ए-पाक पढ़ते हैं और सरवर-ए-दो आलम ﷺ की सीरत पर बयान सुनते हैं।
कुछ लोग महफ़िल-ए-मौलिद सजाते हैं जहाँ अल्लाह की हम्द और नबी ﷺ की शान में अशआर पढ़े जाते हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि इस दिन इंसान अपने दिल को नबी ﷺ की मोहब्बत से रोशन करे और उनकी तालीमात पर अमल का इरादा करे।
पैग़म्बर ﷺ की तालीमात और हमारी ज़िम्मेदारी
नबी-ए-करीम ﷺ की पूरी ज़िंदगी इंसानियत के लिए रहमत बनी। उन्होंने बराबरी का पैग़ाम दिया और सिखाया कि किसी अरब को अजमी पर, और किसी गोरे को काले पर कोई फ़ज़ीलत नहीं सिवाए तक़्वा के।
उन्होंने ग़रीबों और यतीमों का ख़ास ख्याल रखा। औरतों को इज़्ज़त और हक़ूक़ दिए। इंसाफ़ को समाज की नींव बताया और मोहब्बत को ईमान का हिस्सा करार दिया।
हमारी ज़िम्मेदारी यह है कि हम उनकी सीरत को पढ़ें, समझें और अपनी ज़िंदगी में उतारें। अगर हम सिर्फ जश्न मना लें मगर उनके असूलों को भूल जाएँ तो यह महीना अपना असली हक़ हमसे माँगता रहेगा।
रबीउल अव्वल के पैग़ाम
रबीउल अव्वल कई रूहानी पैग़ाम लेकर आता है।
- शुक्र गुज़ारी – अल्लाह का शुक्र अदा करना कि उन्होंने हमें अपने नबी ﷺ की रहमत से नवाज़ा।
- इस्लाह-ए-नफ़्स – अपने आमाल का जायज़ा लेना, गुनाहों से तौबा करना और बेहतर इंसान बनने का इरादा करना।
- ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ – ग़रीबों और मजबूरों की मदद करना, क्योंकि यही सीरत-ए-नबी ﷺ की रूह है।
- मोहब्बत और भाईचारा – नफ़रत और तफ़रक़ों को मिटाकर समाज में अमन, सलामती और भाईचारा फैलाना।
आज की दुनिया के लिए रबीउल अव्वल का सबक
आज का दौर माद्दी दौलत, तफ़रक़ों और तना’ज़ों से भरा हुआ है। लोग इंसानियत से दूर और खुदगर्ज़ी में ग़र्क़ हो चुके हैं। ऐसे में रबीउल अव्वल का पैग़ाम और भी ज़्यादा रोशन नज़र आता है।
नबी-ए-करीम ﷺ की ज़िंदगी हमें यह सिखाती है कि असली इज़्ज़त और कामयाबी इंसाफ़, रहमत और इंसानियत की ख़िदमत में है। अगर हम अपने आस-पास मोहब्बत और आसानी बाँटें तो यही इस महीने की असली रूह होगी।
नतीजा
रबीउल अव्वल सिर्फ एक महीना या तारीख़ का नाम नहीं बल्कि यह पूरी इंसानियत के लिए रहमत और सबक़ है। यह महीना हमें याद दिलाता है कि अल्लाह ने अपने आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ को सारी दुनिया के लिए रहमत बनाकर भेजा। उनकी ज़िंदगी का हर पहलू इंसानियत के लिए रहनुमाई का नूर है। इस महीने का सबसे बड़ा पैग़ाम यही है कि हम उनकी सीरत से रोशनी लें और उनकी तालीमात को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएँ।
अगर हम इस महीने सिर्फ जश्न मनाकर रुक जाएँ तो यह अधूरा होगा। असल जश्न तब है जब हम नबी ﷺ के अख़लाक़ को अपने दिलों और आमाल में उतारें। उनका सबसे बड़ा पैग़ाम इंसाफ़, मोहब्बत, रहमत और भाईचारे का था। उन्होंने हमें सिखाया कि ग़रीबों और यतीमों का सहारा बनो, मजबूरों की मदद करो, औरतों को इज़्ज़त दो और हर इंसान के साथ बराबरी का सलूक करो।
रबीउल अव्वल हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वाक़ई उन तालीमात को ज़िंदगी में लागू कर रहे हैं या सिर्फ रस्म निभा रहे हैं। अगर हम इस महीने यह इरादा कर लें कि अपने आमाल से दूसरों के लिए आसानी पैदा करेंगे, रिश्तों में मोहब्बत और समाज में अमन फैलाएँगे, ग़रीबों और बेसहारा लोगों का हाथ थामेंगे और इंसाफ़ को अपनी पहचान बनाएँगे, तो यही असल जश्न-ए-मीलाद और रबीउल अव्वल का सच्चा मक़सद होगा।
असल में, रबीउल अव्वल हमें यह याद दिलाता है कि सबसे बड़ी इबादत इंसानियत की ख़िदमत है। जो शख़्स इंसानियत के लिए फ़ायदेमंद है वही अल्लाह के नज़दीक अफ़ज़ल है। इसलिए इस महीने का सबक़ यह है कि हम नबी ﷺ की सीरत को अपनाकर अपने दिलों और समाज दोनों को रोशन करें।
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