इस्लाम का असली दुश्मन: अनपढ़ मुसलमान

इस्लाम

यह लेख इस बात पर चर्चा करता है कि मुसलमानों में अज्ञानता कैसे इस्लाम को कमजोर कर सकती है, सही ज्ञान की क्या अहमियत है, और डिजिटल दौर में पारंपरिक शिक्षा की क्या भूमिका है। यह विश्लेषण इस्लामी शिक्षाओं पर आधारित है और आसान भाषा में उन वास्तविक समस्याओं को समझाता है जो तकनीक के गलत इस्तेमाल से ईमान पर असर डाल सकती हैं।

भूमिका

हर समाज में उसकी मजबूती या कमजोरी का असर पूरे समुदाय पर पड़ता है। मुस्लिम समाज में अज्ञानता एक ऐसी कमजोरी है जो दिखती नहीं, लेकिन गहरा नुकसान कर सकती है। इसका मतलब यह नहीं है कि मोबाइल फोन या तकनीक अपने आप में बुरी है, या जो लोग डिजिटल साधनों का इस्तेमाल करते हैं वे गलत रास्ते पर हैं। असली बात यह है कि हम ज्ञान कहां से और कैसे लेते हैं, यह बहुत मायने रखता है, खासकर दीन को समझने, उस पर अमल करने और गलतफहमी से बचाने के लिए।

इस्लाम ने हमेशा इल्म को बहुत ऊंचा दर्जा दिया है। पैगंबर मुहम्मद ﷺ और शुरुआती मुस्लिम विद्वानों ने ज्ञान को इबादत बताया और अल्लाह से नजदीकी का जरिया माना। साथ ही इस्लामी शिक्षाओं में अज्ञानता के फैलने की चेतावनी भी दी गई है। आज के दौर में, जब हर जानकारी मोबाइल पर मिल जाती है, यह बातें और भी ज्यादा जरूरी हो जाती हैं, क्योंकि हर जानकारी सही और फायदेमंद नहीं होती।

अज्ञानता क्यों खतरनाक है

इस्लाम में अज्ञानता सिर्फ जानकारी की कमी नहीं है। यह ऐसी हालत है जिसमें इंसान अपने ही ईमान को ठीक से नहीं समझता और आसानी से गुमराह हो सकता है। पैगंबर ﷺ ने बताया कि क़यामत के करीब इल्म उठा लिया जाएगा और अज्ञानता फैल जाएगी, जो आख़िरी समय की निशानियों में से है।

जब मुसलमान सही समझ से दूर हो जाते हैं, तो वे अनजाने में अपने ही दीन को कमजोर कर देते हैं। बिना ज्ञान के झूठ को सच समझ लेना आसान हो जाता है, गलत और अतिवादी सोच अपनाई जा सकती है, और इस्लाम की जरूरी बातों को नजरअंदाज किया जा सकता है। सच्चा ज्ञान समाज को अंदरूनी भ्रम और बाहरी दबाव से बचाता है, जबकि अज्ञानता गलत विचारों को जड़ पकड़ने का मौका देती है।

ज्ञान हासिल करने की अहमियत

इस्लाम हर मुसलमान को ज्ञान हासिल करने के लिए प्रेरित करता है। पैगंबर ﷺ ने फरमाया कि जो व्यक्ति ज्ञान के रास्ते पर चलता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत का रास्ता आसान कर देता है। उन्होंने यह भी बताया कि फायदेमंद ज्ञान इबादत है और आलिम पैगंबरों के वारिस होते हैं।

इस्लाम में ज्ञान के महत्व के कुछ कारण इस तरह हैं:

सही और गलत की पहचान
ज्ञान इंसान को सही समझ देता है। इसके बिना हलाल और हराम, सही और गलत में फर्क करना मुश्किल हो जाता है।

ईमान को मजबूत बनाना
इस्लाम की गहरी समझ ईमान को मजबूत करती है। जानकार इंसान बेबुनियाद बातों और गलत रुझानों से आसानी से प्रभावित नहीं होता।

दूसरों की सही रहनुमाई
जिसके पास सही ज्ञान होता है, वह दूसरों को भी सही रास्ता दिखा सकता है और भ्रम नहीं फैलाता।

खुद में बदलाव
ज्ञान का मकसद सिर्फ जानना नहीं, बल्कि सोच और अमल में सुधार लाना है।

किताबें और पारंपरिक शिक्षा

किताबों से सीखने की अहमियत आज भी बनी हुई है, खासकर क्लासिकल और विद्वानों द्वारा लिखी गई किताबों की। किताबें किसी विषय को गहराई, क्रम और संदर्भ के साथ समझाती हैं। तफ़्सीर, हदीस, फ़िक़्ह और अक़ीदे जैसे इस्लामी इल्म किताबों और व्यवस्थित पढ़ाई से ही बेहतर समझ में आते हैं।

किताबों से पढ़ाई इंसान में सब्र और अनुशासन भी पैदा करती है। जहां मोबाइल तुरंत जवाब देता है, वहीं किताबें ठहर कर सोचने और समझने का मौका देती हैं। विद्वानों की किताबों में व्याख्या, संदर्भ और संतुलन होता है, जिससे गलतफहमी का खतरा कम रहता है। इसके मुकाबले मोबाइल पर मिलने वाला कंटेंट कई बार अधूरा या संदर्भ से बाहर होता है, जो उलझन पैदा कर सकता है।

डिजिटल दौर: मौका और चुनौती

मोबाइल और इंटरनेट ने ज्ञान को पहले से कहीं ज्यादा आसान बना दिया है। सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो यह बहुत फायदेमंद है। आज लोग अच्छे विद्वानों की तकरीरें सुन सकते हैं, डिजिटल लाइब्रेरी का उपयोग कर सकते हैं, और उन कक्षाओं तक पहुंच सकते हैं जो पहले सिर्फ मदरसों तक सीमित थीं।

लेकिन खतरा तब पैदा होता है जब लोग बिना जांच के सिर्फ छोटे ऑनलाइन कंटेंट पर भरोसा करने लगते हैं। गलत जानकारी तेजी से फैलती है। हदीस या कथन बिना संदर्भ के शेयर किए जाते हैं, और राय को सच की तरह पेश किया जाता है। इससे गहरी समझ की जगह सतही जानकारी बढ़ती है।

तकनीक को ज्ञान की बुनियाद की जगह नहीं, बल्कि सहारा बनना चाहिए। मोबाइल पर पढ़ा गया सार तभी फायदेमंद है जब वह गहरी पढ़ाई की तरफ ले जाए। वरना वह अज्ञानता को और मजबूत कर सकता है।

परंपरा और आधुनिक साधनों का संतुलन

मकसद तकनीक को छोड़ना नहीं है, बल्कि उसे सही संतुलन के साथ इस्तेमाल करना है। यह संतुलन इस तरह बनाया जा सकता है:

बुनियादी किताबों से शुरुआत करें
भरोसेमंद क्लासिकल किताबों और मान्य टीकाओं से पढ़ाई शुरू करें। जरूरत हो तो इनके डिजिटल रूप का इस्तेमाल करें।

योग्य विद्वानों से सीखें
ऐसे शिक्षकों से पढ़ें जिनकी पारंपरिक शिक्षा और पहचान हो। ऑनलाइन कोर्स और वीडियो तभी लें जब शिक्षक विश्वसनीय हों।

जल्दबाज़ी में नतीजा न निकालें
सोशल मीडिया की छोटी पोस्ट या बिना स्रोत की जानकारी पर भरोसा न करें। हमेशा प्रमाणित स्रोत देखें।

तकनीक से पढ़ाई को गहरा बनाएं
मोबाइल का उपयोग संदर्भ जमा करने, शब्दकोश देखने, अनुवाद तुलना करने और विद्वानों की चर्चा सुनने के लिए करें।

इस तरह किताबों की गहराई और तकनीक की सुविधा दोनों का सही उपयोग किया जा सकता है।

निष्कर्ष

अज्ञानता हमेशा से ईमान के लिए बड़ा खतरा रही है, और आज के तेज रफ्तार डिजिटल दौर में यह खतरा और बढ़ सकता है, अगर सीखने के तरीके पर ध्यान न दिया जाए। इस्लाम न तो तकनीक का विरोध करता है और न ही ज्ञान के लिए बेवजह कठिनाई चाहता है। वह ईमानदारी, गहराई और जिम्मेदारी के साथ सत्य की तलाश सिखाता है।

किताबें, विद्वान और व्यवस्थित शिक्षा आज भी इसलिए जरूरी हैं क्योंकि वे स्पष्टता, संतुलन और संदर्भ देती हैं, जो जल्दी-जल्दी देखे जाने वाले ऑनलाइन कंटेंट में अक्सर नहीं मिलता। वहीं, आधुनिक साधन सही बुनियाद के साथ इस्तेमाल किए जाएं तो बहुत मददगार बन सकते हैं। मुस्लिम समाज की ताकत इस बात में नहीं है कि वह कितनी जानकारी इकट्ठा करता है, बल्कि इसमें है कि वह सही ज्ञान को कितनी अच्छी तरह समझता, अपनाता और अपनी जिंदगी में उतारता है। पारंपरिक शिक्षा और समझदारी से तकनीक के इस्तेमाल के जरिए मुसलमान अपने ईमान की हिफाज़त कर सकते हैं, अपनी पहचान मजबूत कर सकते हैं और इस्लाम को समझदारी और भरोसे के साथ आगे बढ़ा सकते हैं।

Source: Pursuit of knowledge: Prophet Muhammad’s enduring legacy & Knowledge is key: The divine gift of understanding in Islam

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