मस्जिदों के इमामों को कम वेतन क्यों मिलता है, इस पर एक स्पष्ट और संतुलित विश्लेषण। इसमें उलेमा और समाज दोनों की भूमिका, व्यावहारिक समाधान और धार्मिक नेतृत्व के प्रति समाज की नैतिक जिम्मेदारी पर चर्चा की गई है।
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भूमिका
मस्जिदों के इमामों की कम तनख्वाह केवल आर्थिक समस्या नहीं है। यह एक नैतिक, सामाजिक और धार्मिक मुद्दा भी है। कई जगहों पर इमाम जो नमाज पढ़ाते हैं, बच्चों को तालीम देते हैं, परिवारों का मार्गदर्शन करते हैं और धार्मिक मूल्यों को संभालते हैं, उन्हें इतनी कम तनख्वाह मिलती है कि बुनियादी जरूरतें भी मुश्किल से पूरी होती हैं।
जब इस मुद्दे पर बात होती है तो अक्सर सारा दोष आम लोगों पर डाल दिया जाता है। कहा जाता है कि समाज पर्याप्त चंदा नहीं देता या मस्जिद की कमेटियां ज्यादा वेतन देना नहीं चाहतीं।
लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। इस विषय पर ईमानदार चर्चा के लिए उलेमा की आत्मजांच और समाज की जागरूकता दोनों जरूरी हैं। असली सवाल सीधा है लेकिन असहज भी। इमामों की कम तनख्वाह के लिए असल में जिम्मेदार कौन है उलेमा या आम लोग।
इमामों को इतनी कम तनख्वाह क्यों मिलती है
कई मस्जिदों में इमाम को मिलने वाली मासिक तनख्वाह दिहाड़ी मजदूर से भी कम होती है। यह हैरान करने वाली बात है क्योंकि उनसे उम्मीद की जाती है कि वे दिन की पांचों नमाजें पढ़ाएं, खुत्बा दें, कुरान की तालीम दें, परिवारों को सलाह दें, जनाजों में शामिल हों, विवाद सुलझाएं और समाज की नैतिक आवाज बनें।
इन सब जिम्मेदारियों के बावजूद वेतन बहुत कम ही रहता है। इसकी एक वजह कुछ इलाकों की आर्थिक स्थिति हो सकती है। लेकिन एक और वजह है जिस पर खुलकर बात नहीं होती। कई इमाम बिना किसी बातचीत के कम वेतन पर काम स्वीकार कर लेते हैं। जब कहीं इमाम की जरूरत होती है तो कई लोग तुरंत तैयार हो जाते हैं। अगर कोई दस हजार मांगता है तो दूसरा आठ हजार में काम करने को तैयार रहता है। इस तरह धीरे धीरे इस पद की कीमत गिरती चली जाती है। इससे मस्जिद कमेटियों को यह संदेश जाता है कि धार्मिक सेवा सस्ती है और आसानी से बदली जा सकती है।
उलेमा और इमामों की भूमिका
यहीं आत्ममंथन की जरूरत है। आर्थिक दबाव, परिवार की जिम्मेदारियों या बेरोजगारी के डर से कई उलेमा ऐसी शर्तें मान लेते हैं जो उनकी अपनी गरिमा को नुकसान पहुंचाती हैं। अक्सर मस्जिद में काम शुरू करने से पहले साफ तौर पर यह नहीं पूछा जाता कि जिम्मेदारियां क्या होंगी। क्या इमाम केवल धार्मिक नेतृत्व करेगा या सफाई, रखरखाव और अन्य गैरजरूरी काम भी करेगा।
कई मामलों में इमाम मस्जिद की सफाई करते हैं, शौचालय धोते हैं, छोटे मोटे काम करते हैं और हर मांग को बिना सवाल किए मान लेते हैं। वे टकराव से बचने के लिए हर बात पर हां कहते हैं। समय के साथ इससे लोगों की नजर में उनकी हैसियत बदल जाती है। इमाम को मार्गदर्शक की बजाय नौकर की तरह देखा जाने लगता है। यह सच्चाई कड़वी है लेकिन वास्तविक है। जब उलेमा अपनी सीमाएं तय नहीं करते तो दूसरे उनके लिए सीमाएं तय कर देते हैं।
आम जनता और मस्जिद कमेटियों की जिम्मेदारी
साथ ही आम जनता भी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। कई समुदाय इमारतों, कार्यक्रमों और सजावट पर खुलकर खर्च करते हैं लेकिन इमाम को उचित वेतन देने में हिचकिचाते हैं। कुछ कमेटियां इमाम को बिना आवाज वाला कर्मचारी समझती हैं, न कि मस्जिद का नैतिक नेतृत्व।
तनख्वाह में देरी, लगातार आलोचना, बेवजह का दबाव और धार्मिक मामलों में दखल इमाम की स्थिति को कमजोर करता है। कई बार जब इमाम कुरान और हदीस के आधार पर सच्ची बात कहता है तो सामाजिक दबाव उसे चुप करा देता है। यह पूरे समाज की रूहानी सेहत के लिए खतरनाक है। जो समाज अपने धार्मिक नेताओं की इज्जत की हिफाजत नहीं करता वह धीरे धीरे अपनी नैतिक दिशा खो देता है।
कम तनख्वाह के नतीजे
इस व्यवस्था का असर सिर्फ पैसों तक सीमित नहीं रहता। कम वेतन से आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है, लगातार तनाव रहता है और आर्थिक परेशानियां बढ़ती हैं। कई इमाम अपने परिवार का खर्च चलाने में जूझते रहते हैं। इसी कारण कई उलेमा अपने बच्चों को मदरसों की बजाय सामान्य स्कूलों में भेजने का फैसला करते हैं। यह इसलिए नहीं कि वे दीन की तालीम को गलत मानते हैं बल्कि इसलिए कि वे वही मुश्किल जिंदगी अपने बच्चों के लिए नहीं चाहते। जब काबिल और पढ़े लिखे लोग धार्मिक पेशे से दूर होने लगते हैं तो पूरा समाज नुकसान उठाता है। नेतृत्व की गुणवत्ता गिरती है और संस्थाएं अंदर से कमजोर होती जाती हैं।
असली बदलाव के लिए व्यावहारिक समाधान
बदलाव मुमकिन है लेकिन इसके लिए दोनों पक्षों को कोशिश करनी होगी।
पहला
इमामों को अपनी कीमत समझनी होगी। ऐसी तनख्वाह स्वीकार करना जो बुनियादी जरूरतें भी पूरी न करे, इसे परहेजगारी नहीं समझा जाना चाहिए। अस्थायी बेरोजगारी मुश्किल हो सकती है लेकिन लंबे समय की इज्जत ज्यादा जरूरी है। मस्जिद जॉइन करने से पहले जिम्मेदारियों पर साफ बातचीत होनी चाहिए।
दूसरा
उलेमा के बीच एकता बहुत जरूरी है। अगर एक इमाम कम वेतन पर काम करने से मना करे और दूसरा कम पर तैयार हो जाए तो हालात कभी नहीं बदलेंगे। सामूहिक मानक तय करना जरूरी है।
तीसरा
मस्जिद कमेटियों और प्रबंधन की अहम भूमिका है। एक न्यूनतम उचित वेतन तय करना और उससे कम पर पद खाली न निकालना सोच बदल सकता है। यह लालच नहीं बल्कि इंसाफ है।
चौथा
आत्मसम्मान रोजमर्रा के व्यवहार में दिखना चाहिए। इमाम को ईमानदारी से सेवा करनी चाहिए लेकिन गुलामी की सोच के साथ नहीं। सम्मान मांगा नहीं जाता बल्कि साफ सोच, आत्मविश्वास और लगातार सही व्यवहार से हासिल किया जाता है।
इमाम के अधिकार
इस्लाम धार्मिक नेतृत्व की इज्जत और गरिमा पर जोर देता है। इमाम को सम्मान, निष्पक्ष आलोचना, समय पर तनख्वाह और धार्मिक मार्गदर्शन में स्वतंत्रता का हक है। उसके समय, परिवार और मानसिक सेहत की कद्र होनी चाहिए। उसे दीन का सेवक समझा जाना चाहिए न कि निजी काम करने वाला व्यक्ति। इमाम की इज्जत करना किसी एक इंसान की नहीं बल्कि उस धर्म की इज्जत है जिसका वह प्रतिनिधि है।
साझा जिम्मेदारी
इमामों की कम तनख्वाह की जिम्मेदारी किसी एक पक्ष पर नहीं डाली जा सकती। उलेमा को खुद को कमतर आंकना बंद करना होगा और समाज को उनकी खामोशी का फायदा उठाना छोड़ना होगा। असली सुधार तभी आएगा जब दोनों अपनी जिम्मेदारी समझें और साथ मिलकर काम करें।
इमाम को मस्जिद में मजबूर नौकरी ढूंढने वाले की तरह नहीं बल्कि एक नेता के रूप में आना चाहिए। समाज को भी उसे बोझ नहीं बल्कि एक संपत्ति की तरह अपनाना चाहिए।
निष्कर्ष
मस्जिदों के इमामों की कम तनख्वाह की समस्या किसी एक को दोष देकर हल नहीं हो सकती। यह एक साझा नाकामी है जो समय के साथ बनी है। जब उलेमा चुपचाप गलत शर्तें मान लेते हैं तो व्यवस्था कमजोर होती है। जब समाज और मस्जिद कमेटियां इमामों की आर्थिक और भावनात्मक जरूरतों को नजरअंदाज करती हैं तो नाइंसाफी सामान्य बन जाती है। दोनों पक्ष किसी न किसी तरह उसी नतीजे में योगदान देते हैं।
धार्मिक सेवा का मतलब अपमान या लगातार संघर्ष भरी जिंदगी नहीं होना चाहिए। जो इमाम किराया, फीस और रोजमर्रा की चिंता में डूबा हो वह दूसरों का सही मार्गदर्शन नहीं कर सकता। साथ ही धार्मिक नेतृत्व में गरिमा की शुरुआत आत्मसम्मान से होती है। उलेमा को साफ बोलना होगा, सीमाएं तय करनी होंगी और कुर्बानी के नाम पर गरीबी को सामान्य मानने से इनकार करना होगा।
समाज को भी अपनी प्राथमिकताओं पर दोबारा सोचना होगा। इमारतें और कार्यक्रम जरूरी हैं लेकिन इंसान उनसे ज्यादा कीमती है। एक सम्मानित और आर्थिक रूप से सुरक्षित इमाम ईमान, एकता और नैतिक दिशा को मजबूत करता है। उसका सहयोग करना दान नहीं बल्कि समाज के भविष्य में निवेश है।
असली सुधार तब शुरू होगा जब उलेमा एकजुट होंगे और समाज सच्चाई से उनकी बात सुनेगा। जब दोनों तरफ गरिमा बहाल होगी तो मस्जिद फिर से मार्गदर्शन की जगह बनेगी, खामोश पीड़ा की नहीं।
Source: Wages for Alims and Imams. & Issue of Salary for Teachers, Preachers, Imams, and Muezzins
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